हिंदू शास्त्र में स्वस्तिक की मान्यता ||

“स्वस्तिक मंत्र ! शुभ और शांति के लिए इस मंत्र का प्रयोग करें!”

स्वस्तिक मंतर  या स्वस्ति मन्त्र सुख व् समृद्धि के लिए प्रयोग  होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा कहा  जाता है कि इससे दिल दिम्माग यानी की मन मस्तिष्क मिल जाते हैं।

मंत्रो उच्चारण करते हुए जल पात्र से जल के छींटे डाले जाते है | तथा यह भी माना ही जाता है  कि यह जल आपसी मतभेद व् गुस्से को शांत करता है l 

स्वस्तिक हमारे पुराने हिन्दू संस्कृति से जुड़ा हुआ है l और प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति का सूचक भी मन जाता है l इसीलिए हमारे हिन्दू धरम में किसी भी मांगलिक व् शुभ काम में स्वस्तिक चिन्ह को अंकित करके उसका पूजन सर्व प्रथम किया जाता है।

स्वस्तिक का शाब्दिक अर्थ होता है-

स्वस्तिक शब्द का मतलब है सु+अस+क यानी की ‘सु’ का मतलब  सुन्दर ,’अस’ का मतलब  ‘सत्यता ‘ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का मतलब  ‘करता ‘ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का मतलब  हुआ ‘अच्छा’ या ‘मांगलिक ‘ करने वाला।

‘स्वस्तिक,सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्ध नहीं रखता बल्कि पूरे  विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भाव सम्मलित है l 

हिंदू  पूजा विधान में स्वस्तिक का महत्तव |

हिन्दू धर्म में पूजा पाठ के स्थान पर सबसे पहले कोई भी शुभ काम प्रारंभ करने से पहले साथिया या स्वास्तिक मांडा जाता है l  

1. हिंदू घरों परिवारों  में शादी के पश्चात  वर-वधु को स्वस्तिक अथार्त साथिये के दर्शन करवाये जाते हैं,ताकि वे दोनों ही एक सफल विहवाहिक  जीवन प्राप्त कर सकें।

2.हिन्दू धर्म के अनुसार कई जगह व् राज्यों में नवजात बच्चे  को छठी यानी जन्म के 6ve दिन स्वस्तिक यानि सातिया मंडे हुए कपडे पर लेटाया जाता है l  

3. राजस्थान जैसे कई राज्यों में नई नवेली दुल्हन की ओढ़नी यानि चुन्नी पर स्वस्तिक को बनाया जाता है। माना  जाता है कि इससे बहु  के सुख सौभाग्य में उन्नति  होती है।

4. गुजरात जैसे कई राज्यों में लगभग हर घर के मुख्य द्वार पर  रंगों से या रोली कुमकुम से स्वस्तिक बनाए जाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। कहा  जाता है कि इससे घर परिवार में धन धान्य ,वैभव की कभी भी कमी नहीं होती है और मेहमान  हमेशा ही  शुभ व् अच्छा समाचार लेकर घर में प्रवेश करता है l 

5. वेदो के अनुसार ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक यानी सातीये को सूर्य देव का सूचक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं के सामान बताया गया है l  

6. सिद्धांत सार ग्रन्थ में इसे चार वेदो के रूप में मन गया है l 

अन्य ग्रन्थों में 4  युग,4  वर्ण, 4  आश्रम एवं धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष के 4  प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था में सातीये को आसथा के ओत- प्रोत बताया गया है।

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मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है।

यह मांगलिक चिह्न प्राचीन काल से पूरे संसार में व्याप्त रहा है। और हमारे भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक व् सातीये को शुभ मंगल होने का प्रतीक माना जाता है।  

स्वस्तिक मंत्र का रोज़ाना जाप करने से आप आंतरिक सुख की अनुभूति करेंगे l  

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।

स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।

स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

 

प्रभु  हमारा कल्याण करें।

 

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