हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार गुरु पूर्णिमा व गुरु का महत्त्व। 

गुरु अथवा शिक्षक की महत्ता अपरम्पार है। इसकी  कहने मात्र से व्याख्या नहीं कि जा सकती । सभी वेद,व्  पुराण, और हमारे उपनिषद, आदि सब गुरु की महिमा की  व्याख्या करते हैं।

शास्त्र व् पुराणों के अनुसार  ‘गु’ यानी  ‘अंधकार या मूल अज्ञान’ और ‘रू’ यानी  ‘उसका अवरोधक  बताया जाता  है l  जिसका मतलब  ‘अँधेरे से रौशनी  की ओर ले जाने वाला’l  यानी अज्ञानता के अँधेरे को मिटाकर ज्ञान का रास्ता  दिखाने वाला ‘गुरु’ कहलाता  है।

गुरु को ईश्वर से भी उप्पर स्थान दिया गया है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

यानी की  गुरु ही ब्रह्मा है, और  गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं साक्षात् प्रणाम करता हूँ।

सन्त कबीर कहते हैं:-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय।।

अर्थात, गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए l और गुरु को अथवा गोबिन्द को? ऐसी परिस्थिति में गुरु के कमल चरणों में शीश झुकाना सर्वो उत्तम है, जिनकी कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द यानि भगवान् का दिव्य दर्शन करने का सौभाग्य मिला ।

संत तुलसीदास जी तो गुरू को मनुष्य रूप में नारायण यानी भगवान ही मानते हैं। वे रामचरितमानस में लिखते हैं:

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।

महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।

यानी  गुरु मानव  रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धकार  ख़तम हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोह रूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।

गुरु हमारा सदा ही सच्चा मार्गदरशन करने वाला होता है। वह हमेशा हमारे हित  के बारे में सोचता है l और एक अच्छे रास्ते  पर चलने की प्रेरणा  देता है।

गुरु चाहे कितना ही कठिन स्वभाव वाला क्यों न हो, उसका एक ही  उद्देश्य होत है की  शिष्य का कल्याण करना l गुरु से ही हम एक सौम्य इंसान यानी सर्व श्रेष्ठ इंसान बनते  है।

हमारे बुरे गुणों को समाप्त करने की हर प्रयास गुरु ही करता है। 

सन्त कहते हैं कि गुरु के शब्दों या कथनी पर शक  करना शिष्य पर कलंक होता  है। जब  शिष्य  गुरु को ही अपना सरस्व मानना शुरू किया उसी दिन से उसकी  तरक्की  शुरू हो जाटी  है और गुरु के प्रति शंका करने से शिष्य का पतन शुरू हो जाता हैl  

इसलिए हमें अपने गुरू यानी शिक्षक का पूरा आदर करना चाहिए और गुरु की बातो व् ज्ञान का अच्छे से अपने जीवन में पालन करना चाहिए।

कोई भी ऐसा कार्य कभी नहीं करना चाहिए, जिससे गुरु यानी शिक्षक के आत्मसम्मानको ठेस पोहोचे l 

कभी भी गुरु के समीप या उनके समान होकर नहीं बैठना चाहिए l   अपितु नीचे होकर ही आसान ग्रहण करना चाहिए l गुरु की कभी भी चुगली या उनकी आदतों की नक़ल नहीं करनी चाहिए l 

गुरु के पीठ पीछे उनका नाम आदर सहित लेना चाहिए l और गुरु के लिए जहा कही भी बुरी बाते हो रही हो , वहां से चला जाना चाइये l या फिर कानों बंद कर ले l  गुरु से हमेशा भेट होने पर चरण छू लेने के पश्चात ही वार्ता करनी चाहिए l

विशेष:-

 बेहद आश्चर्यजनक  विषय है कि आजकल  गुरु-शिष्य के बीच वो सम्मानित  एवं प्रेम भरा सम्बंध देखने को नहीं मिलते हैं, जो पहले  में भारतीय संस्कृति में देखने को मिलते थे।

 लेकिन, सही व् सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु का आदर करना बेहद आवश्यक है हमें यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए l नहीं तो हमें कभी भी सही रास्ता हासिल नहीं होगा।

अन्य वास्तु टिप्स के लिए यहाँ पढ़े l 

Leave a Comment

%d bloggers like this: